Wednesday, January 8, 2020

आकांक्षाओं ने लांघी दहलीज

आकांक्षाएं, इच्छाएं, अभिलाषाएं, जरूरतें, ख्वाहिशें और अति आवश्यकताएं मानव जीवन के लिए अभिशाप बन गई हैं। जिन्होंने भारतीय संस्कृति, संस्कार, सम्मान और सेवा को दरकिनार करते हुए बनावटी और खोखली जिन्दगी को आत्मसात कर लिया है। आखिर जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं क्या हैं, कभी इप पर चिन्तन-मनन किया है? भारतीय सामाजिक परिवेश का तानावाना जिसे आदिकाल से ऋषि-मुनियों और तपस्वीयों ने अपने तपोबल, त्याग और अथक परिश्रम से बुना था, उसे आधुनिक भारत ने विखण्डित कर अपनी संस्कृति का घोर अपमान तो किया ही है, साथ ही पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर अपने कर्तव्य का हनन भी किया है। आदिकाल से विश्वगुरू रहे अखण्ड भारत को आज जागरुक करने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी है?
माता-पिता, बुजुर्गों के सम्मान, संस्कृति और संस्कारों की दुहाई सम्पूर्ण भारतवर्ष में देखी जा सकती है। आखिर क्यों, जिस सत पथ पर चलने की जरूरत थी, उसे नजरअंदाज करते हुए असत्य और अहम का रास्ता चुनकर न सिर्फ अपनी विरासत को धोखा दिया है, बल्कि सनातन संस्कृति के साथ अपने पूर्वजों, महान ऋषियों, तपस्वीयों का भी घोर अपमान किया? भारतीय संस्कृति हमारी धरोहर है। सेवा, समर्पण और सम्मान हमारा गुरूर है। जिसके बल पर हमने विश्वगुरू होने का अधिकार पाया था। खण्डित होती विरासत और विलुप्त होती धरोहर के जिम्मेदार केवल हम और आप हैं। इसका दोषारोपण किसी और पर नहीं किया जा सकता। परिवार का महत्व, सेवा का भाव, त्याग की परिकल्पना, दर्द का अनुभव और अपनों की अहमियत अब कहां रही है? अपने आप में संसार बसाकर रिश्तों की इति करने वाले आज के समाज ने सबकुछ खो दिया है।
अखण्ड विश्वगुरू भारत की गरिमामयी दहलीज को आकांक्षाओं ने बलिवेदी पर चढ़ा दिया है। अब फिर से विश्वगुरू होने का झूठा राग अलापते भारतवाषी इस पावन देश को तब तक विश्वगुरू नहीं बना सकते, जब तक प्राचीन भारत के स्वरूप को कायम नहीं कर पाते हैं। मानवीय संवेदनाओं को आत्मसात करने और सनातन संस्कृति को जीवन में उतारने की ललक ही भारत को उसका स्वरूप लौटा सकती है। कहावत है, ‘‘जब जागो, तब सवेरा’’ अभी वक्त है और सबकुछ हमारे हाथ में है। दुनिया ने हमारी विरासत, धरोहर, परम्पराओं और संस्कृति से बहुत कुछ हासिल कर अपने आपको सर्वशक्तिमान और सर्व सम्पनन बना लिया है। वहीं हमने दूसरों के आडम्बरों को अपने जीवन में स्थान देखकर अपनी मातृभूमि के साथ अन्याय कर डाला है। ‘‘कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूंडे बन माहि’’ अर्थात सर्वस्व हमारे पास होते हुए भी हम कल्पनाओं में जी रहे हैं। सम्पूर्ण और सर्वस्व हमारी संस्कृति में छिपा है। जिसके आत्मज्ञान से हम अपने खोए स्वरूप को पुनः अर्जित कर सकते हैं। आओ फिर से आधुनिक भारत को संवारने का दृण संकल्प लें और अपने कर्तव्य का पालन करें। जय हिन्द!

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