Wednesday, January 15, 2020

मन करता है...

मेरा भी मन करता है कि मेरे पास अपार धन-दौलत हो, बड़ा सा बंगला हो, लग्जरी गाड़ी हो और लोग मेरी वाहवाही करें। लेकिन क्या ये बाकई सम्भव हो सकता है। वर्तमान में ये सम्भव हो भी सकता है और नहीं भी। होने की सम्भावना केवल काली कमाई ही हो सकती है और वहीं न होने की उम्मीद मेहनत-मजदूरी, ईमानदारी और सच्चाई। जिसके चलते ये सारी सुविधाएं प्राप्त कर पाना मुश्किल है। काली कमाई से रुतबा और शौहरत तो हासिल की जा सकती है, लेकिन संतोष, आत्मिक अनुभव और जीवन जीने की कला कभी नहीं मिल सकती।
          अब मैं सोचता हॅू कि आखिर, मैंने मेहनत और ईमानदारी से जीवन जीकर क्या पाया? न तो मैं अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दे पाया और न अमीरों जैसी सुख-सुविधा। आखिर, मेरे अपनों का कुसूर क्या था, जिससे मैंने उन्हें बंचित रखा? उनको बेहतर जीवन यापन कराना और उच्च शिक्षा दिलाकर बड़ा आदमी बनाना भी तो मेरा ही कर्तव्य बनता था, तो क्या मैंने अपना कर्तव्य सही तरीके से नहीं निभाया? ये आत्ममंथन मेरे ह्दय में निरंतर उथल-पुथल मचाता रहता है और मैं ये निर्णय नहीं कर पाता हूं कि आखिर, मैंने सही किया या गलत।
अब मैं अपनी मेहनत, सच्चाई और ईमानदारी की कमाई और अमीरों की छल-कपट, मिलावट, सूदखोरी, घूसखोरी, बेईमानी, शोषण, अत्याचार, लूट-खसोट और काली कमाई का तुलनात्मक अध्ययन करता हूं। जहां मुझे उनकी और उनके बच्चों की जिन्दगी दूर से ऐशो आराम और सर्व सुविधाओं से सम्पन्न दिखाई देती है। वहीं मेरी और मेरे परिवार की जिन्दगी दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज और आंसुओं से भरी है। ये एक ऐसा सच है, जिसे आज का इंसान भलीभांति स्वीकार करने पर मजबूर है। लेकिन इसकी असल तस्वीर हर कोई नहीं देख पाता।
          जब मैंने इस तस्वीर के करीब जाकर देखा तो मेरे पैरों तले से जमींन ही खिसक गई। सच वो नहीं, जो दिखाई दे रहा था। सच तो वो था, जिसे आत्मिक तौर से मैंने अनुभव किया। मैंने देखा जो लोग धन-दौलत और शौहरत भरी अहंकारमयी जिन्दगी जी रहे हैं, उनके अपने और बच्चों के दिखावे महज बनावटी हैं। उनके जीवन में एक खालीपन और आत्मिक लगाव शायद मृत हो चुका है। दौलत के नशे ने उनके शरीर में अहंकार, नफरत, अकेलापन और अमानवीय कारकों को कूट-कूटकर भर दिया है, जहां उनके ह्दय में स्वयं के अलावा और किसी के लिए न कोई स्थान है और न किसी के लिए सम्मान ही। यही बजह है कि दौलतमंद अंत में केवल अकेला ही खड़ा है, उसके अपने रिश्ते-नाते उसका साथ छोड़ चुके हैं, क्योंकि उन्हें केवल दौलत से प्रेम है। इस तस्वीर को देखकर मेरे कदम अनायास ही पीछे लौट पड़े।
          इसके विपरीत मैंने अपने कर्तव्यनिष्ठ और दुखित जीवन की तस्वीर को करीब से देखने की हिम्मत जुटाई, जिसे देखकर मेरी आंखों से आंसू बह निकले और मैंने अपना अभावमय जीवन दौलतमंद लोगों से कहीं बेहतर और उच्च अनुभव किया। इसका कारण केवल मेरा परिवार ही था, जो इस हालात में भी मेरे साथ खड़ा था। भोजन की कम उपलब्धता पर भी मेरे बच्चों ने भूखे रहकर दो-दो टूंक बांटकर खाया, दुख और सुख इस घड़ी को मिलकर सहन किया। अपने दुख को भूलकर दूसरों के दुख में शामिल हुए और कभी मुझे इस बात का अहसास नहीं होने दिया, कि वो इस अभावमय जीवन में दुखी हैं, ताकि कहीं मैं उनके दुख से दुखी न हो जाऊं। आज मैं समझ गया कि मैंने अपने बच्चों को संस्कारों की दौलत दी है, ईमानदारी और सच्चाई का रास्ता दिखाया है, जिसके पथपर चलकर वो निश्चित रूप से एक बेहतर इंसान बनेंगे। शायद आज मुझसे ज्यादा दौलतमंद कोई नहीं, जिसके साथ उसके रिश्तों की डोर बंधी है। 

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