Friday, January 10, 2020

प्रेम ब्रह्मास्त्र है

प्रेम दुनिया का सबसे सुखद और संवेदनशील सम्बन्ध है, जिसके माध्यम से अद्भुत से अद्भुत कार्य आसानी से सम्पन्न किए जा सकते हैं। जहां सारे अस्त्र और शस्त्र विफल हो जाएं वहां प्रेम से विजय सहज ही हासिल की जा सकती है। अब सवाल ये उठता है कि, आखिर प्रेम का स्वरूप क्या है? प्रेम की परिभाषा क्या है? प्रेम किस प्रकार किया जा सकता है और प्रेम करने के लिए किस वस्तु की आवश्यकता है? जिज्ञासाएं बहुत हैं, लेकिन सबका समाधान एक मात्र प्रेम ही है। आइए प्रेम के इस गूढ़ रहस्य की गुत्थी को हम और आप मिलकर सुलझाते हैं।
प्रेम प्रकृति का वो निःशुल्क वरदान है, जो प्रत्येक जीव जगत के ह्दय में विद्यमान है। जरूरत है उसे पहचानने और सही तरीके से क्रियान्वयन करने की। सम्पूर्ण सृष्टि में निवास करने वाली जीवात्मा ही प्रेम का स्वाद अनुभव कर सकती है और प्रेम कर सकती है। उदाहरण स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण और राधा का सात्विक प्रेम जो आज भी बृजभूमि के कण-कण विद्यमान है। ऐसे प्रेम की परिकल्पना कर पाना मानव के बस में तो नहीं, लेकिन उसके समक्ष प्रयास कर मानव जीवन को सफल बनाया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति, जीव और जगत से आत्मिक लगाव रखते हुए उनके सुख-दुख में समाहित हो जाना ही प्रेम का पहला मूलमंत्र है। जब हमारा ह्दय दूसरों की पीड़ा को अनुभव करने लगे और अनायास दूसरों के सुख का अनुभव अपने ह्दय में जागृत होने लगे, तो समझो प्रेम की प्रगाढ़ता शिखर की ओर प्रवाहित हो रही है।
जो अपना है, वो सबका है और जो सबका है, वो अपना है। इस भाव के प्रादुर्भाव का उदय मनुष्य को महानता की ओर ले जा सकता है। प्रेम के इस माधुर्य को आत्मसात करने वाले मनुष्य को अंगारों से गुजरना पड़ता है। प्रेम की राह कठिन जरूर है, लेकिन उसका लक्ष्य परम् ब्रह्म के समक्ष है। जिसने प्रेम की पराकष्ठा को पार कर लिया, समझो उसने सम्पूर्ण सृष्टि का आनंद प्राप्त कर लिया। विश्वविजय का ये प्रेममयी अश्वमेघ यज्ञ जीतने वाले महान पुरुष केवल भारत की धरा पर ही प्रगट हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे। प्रेम सर्वदा अमर है, इसका कभी अन्त नहीं हो सकता। स्वार्थ से परे हटकर निःस्वार्थ का भाव ही हमें महान बनाता है।
प्रेम की पराशक्ति का आभास जिसने भी किया, उसने सम्पूर्ण जगत को अपना बना लिया। न धर्म से, न जाति से, न वर्ग से, न वर्ण से और न किसी जीव से, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि से प्रेम का पुजारी समस्त अस्त्रों और शस्त्रों को विफल करते हुए ब्रह्माण्ड में प्रेम स्थापित कर हमेशा के लिए अमर हो जाता है। जब प्रेम में इतनी शक्ति है अर्थात प्रेम ब्रह्मास्त्र है, तो फिर क्यों न हम सम्पूर्ण जगत से प्रेम करें। आओ हम सम्पूर्ण सृष्टि को प्र्रेममय बनाकर सदा-सदा के लिए अमर हो जाएं।

No comments:

Post a Comment

मजहब नहीं सिखाता....?

भारत देश की एकता और अखण्डता पर आज प्रश्न चिन्ह खड़े होना निराशाजनक ही नहीं अपितु बड़ी चिन्ता का विषय है। बात देश के वर्तमान हालात की है। चारो...